हो के रू-ब-रू गर धड़क जावे तो क्या कीजै,दिल ही तो है
फिसलकर जिस्म से निकल जावे तो क्या कीजै,दिल ही तो है
कर के रुक्सत महफ़िल को जब उठती नजर तुम पर झुके
जुम्बिश धडकनों में हो जावे तो क्या कीजै,दिल ही तो है
लगा कर रूह से,उनकी जो हमने दो अंगड़ाईयाँ चुरा ली
इस पे आवारा कहा जावे तो क्या कीजै,दिल ही तो है
उँगलियों की नोक से बदन की लिखावटें पढ़ डालीं तमाम
फिर भी अयाना कहा जावे तो क्या कीजै,दिल ही तो है
दीद में उम्रें गुजारीं पलकों से पलकें मूँद कर
नशा आँखों में उतर आवे तो क्या कीजै,दिल ही तो है
जौक-ऐ-सुखन जबस रग-रग में दौड़े है "तीर्थराज"
पे आशिकाना कहा जावे तो क्या कीजै,दिल ही तो है
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