Tuesday, February 28, 2012

ग़ज़ल

अपनी जहानत पे कुछ ऐतबार किया करो
हर फैसले सिक्के उछाल के ना लिया करो

हार-जीत की तर्ज़ पे गुजारी नहीं जाती ये 
जिंदगी है आखिर,बेबाक हो के जिया करो

एक उम्र आएगी बाँछों पे सफेदी छाने की 
रंगीनियों को तब तलक तवज्जो दिया करो

ना-आशना सी होंगी जनान-खाने की दीवारें 
दौर-ऐ-जवानी में ही बेसबब इश्क किया करो

कड़वाहटें पिलायेंगे चारागर नुस्खे निकाल के
मैकश नजरों से तब तलक जी-भर पिया करो

क़यामत खुदा की हथेली पे रक्खी है "तीर्थराज"
तुम अपने हाथों अपना कफ़न ना सिया करो 
 


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