Tuesday, February 14, 2012

ग़ज़ल

सच है खुद्दारी में कोई वफायें निभा नहीं सकता
तर्ज पे हुक्मरानी के ख्वाहिशें फरमा नहीं सकता

बड़ी मुददत हुई जालिम आशिकी फ़साना ना सुना
मजनू कहाँ जो सरे बाज़ार सितम उठा नहीं सकता 

यूँ होंगे बहुत इंसानी चौखटों पे सजदे नवाने वाले 
इन  हुस्न-ऐ-मुसाहिबों को काबा रिझा नहीं सकता   

फ़रिश्ते सिफारिश ले आयें,जबस  मुमकिन है "तीर्थराज"
वरना दिल्लगी की खातिर मैं औ' सर झुका नहीं सकता 

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