Tuesday, January 31, 2012


खडका-ऐ-खुदा था उसमे,तो कुफ्र-ऐ-जानिब भी जिन्दा था
मुल्क-ऐ-हिंदी-ओ-उर्दू में एक फारस-ऐ-साहिब भी जिन्दा था 

शायरी का हुनर कुछ फरेब सा लगने लगता है "तीर्थराज"
सुनता हूँ जब किसी दौर में कोई "ग़ालिब" भी जिन्दा था  

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