Wednesday, November 02, 2011

'मधुशाला'


"तीर्थराज" के अधरों को जब छू गयी पावन हाला
मदिरालय में होकर हर्षित झूम उठी साकी बाला
अगणित दफे सुने थे उनसे जलवे इस पैमाने के
एक बार जो चखी तो मैंने पी ली पूरी 'मधुशाला'


हाथ उठाकर देखो तुम भी रास-सुरा का एक प्याला
फेंक उतारेगी ये तेरी जुबाँ पे रक्खा वो ताला
 मदिरालय में अपने आंसू "तीर्थराज" तुम ले आओ
शुरू करेंगे पीनेवाले,ख़त्म करेगी 'मधुशाला'


मृगनयनी किसी पर मैं था ह्रदय लुटाता मतवाला
छलक-छलक खुद को छलकाकर पास बुलाती थी हाला
अधरों से जिसके पी-पी कर "तीर्थराज" इतराता था
चला गया है यौवन उसका,जवां अभी है 'मधुशाला'




काशी-तट पर कुषा बिछा मैं जाप रहा तुलसी-माला
एक अंजुली में गंगाजल..दूजे में भर कर हाला
किस मंथन में जुटे हो योगी,रघुवर ने ही पूछ लिया
पाप,पुण्य को तोल रहा हूँ.प्रभु जीत रही है 'मधुशाला'

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