झूठे इशारों पर भी जो मुस्कुराने लगते हैं
महफ़िल में वही चेहरे कुछ पहचाने लगते हैं
तौफीक से अपनी,ये हया पे परदे डाल कर
हुस्न-ए-हराम का घूंघट सरकाने लगते हैं
इनकी मोहसिन मिजाजी का है अंदाज अलग
काबे के जलसे में भी सिक्के बरसाने लगते हैं
चेहरे हिजाबों में रख कर पेश-ए-नजर कीजिये
त्योरियों की हरकतें भी इन्हें अफ़साने लगते हैं
होश-ओ-खबर में तालीम-ए-इश्क दे रहे हैं "तीर्थराज"
जिस हुनर की खातिर वायज को पूरे मैखाने लगते हैं
No comments:
Post a Comment