Tuesday, November 08, 2011

ग़ज़ल

कुछ अपना दिल कुछ तसव्वुर-ए-इदराक मिला के लिखता हूँ
मैं जब भी लिखता हूँ स्याही-ओ-लहू मिला के लिखता हूँ

प्यासे शहर भर में दहलीज-ए-सुखन की पनाह मांगते हैं 
मैं आजकल उसकी जुल्फों से घटाएं चुरा के लिखता हूँ 

आइना बासफा लफ्ज़ कहें बेबाक,उसकी फितरत है जालिम 
रेजा-रेजा अक्स के चेहरे से,मैं सिलवटें छुपा के लिखता हूँ 

कौन जाने उसकी बेनियाज़ी में कैसी हसरतें हैं मुज्मर
वो सितम ढाता है ख़ुलूस से,मैं वफायें निभा के लिखता हूँ

इन मुशायरों में इब्तेदा की गुंजाईश थोड़ी कम है "तीर्थराज"
लफ्ज़ ग़ज़ल बनाते हैं,मैं नज्मों से अलफ़ाज़ बना के लिखता हूँ 



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