Saturday, March 31, 2012

ग़ज़ल


कहो इतनी अदाएं तुम लाते हो कहाँ से
ठिकाने यहीं हैं तेरे,या किसी और जहाँ से 

माँ बचपन में कहती थी परियों के किस्से 
कहीं तुम उतर तो नहीं आई हो आसमाँ से 

कान में जाके कहा मैंने जो कुछ उनसे 
हवा भी शर्मा कर भाग निकली वहाँ से 

नजाकत ऐसी ही हैं कुछ उस माहजबीं की 
परवाना बच के जाए भी तो किधर शमाँ से 

नुक्कड़ पे मजमों की शिकायत बुजुर्गों को है 
वो छत पे निकल आये,लोग गुजरें कैसे यहाँ से 


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