Monday, March 05, 2012

नज़्म

ऐ नगर-ऐ-फिरदौस की तू परीजाद सुन अभी
ये मेरे दिल की है जो अनकही सी दास्ताँ

तुम नहीं थी साथ लेकिन फिर भी मेरे हर तरफ
रहता था बिखरा-बिखरा एक तेरा ही निशाँ 
जाने कितने दौर गुज़रे तुम नहीं आई मगर
फिर भी जो रक्खा संभाले,है वही ये आशियाँ 

ऐ नगर-ऐ-फिरदौस की तू पारिज़ाद सुन अभी
ये मेरे दिल की है जो अनकही सी दास्ताँ

चाह ना थी परियों की ना आरजू-ऐ-हुस्न थी
तेरी एक झलक को हम थे ताकते जो रास्ते
आज उन सब रास्तों की मंजिलों जो हैं मिली
कैसे करूँ उन चाहतों को लेकर मैं तुझसे बयाँ

ऐ नगर-ऐ-फिरदौस की तू परीजाद सुन अभी
ये मेरे दिल की है जो अनकही सी दास्ताँ

देखता था छुप-छुप मैं भी शमा की आड़ से
तकती थी जब-जब तुम परदे की दीवार से
धूप में मेहताब की रंगतें जला करती थीं
संग लेकर सारे इन धडकनों के भी अरमाँ 

ऐ नगर-ऐ-फिरदौस की तू परीजाद सुन अभी
ये मेरे दिल की है जो अनकही सी दास्ताँ 

आज भी उन लम्हों के मंजर मेरी आँखों में हैं
आसमाँ की शाख पे उडती तितलियों की तरह
बेनियाज़ी से तेरी हमें कोई गिला नहीं
कह ना देना बस कभी मैं हूँ तेरे लिए अंजान

ऐ नगर-ऐ-फिरदौस की तू परीजाद सुन अभी
ये मेरे दिल की है जो अनकही सी दास्ताँ

नज्म है ये सिलसिलों के उलझे अल्फाज़ से बनी 
वक़्त की देहलीज पर झरोखों का दस्तक हो जैसे
एक-एक अशआर हैं चुन-चुन कर लिखे गए
बना रहा था "तीर्थराज" ख्वाबों का कोई गुलसितां

ऐ नगर-ऐ-फिरदौस की तू परीजाद सुन अभी
ये मेरे दिल की है जो अनकही सी दास्ताँ  




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