Wednesday, April 04, 2012

ग़ज़ल

कुछ-कुछ जो तुम रोज लिखा करते हो
वो कौन है भला जिसको अता करते हो

जुबाँ फिर क्यूँ जाती है मजलिस में तेरी 
सुना है खामोशियों में खूब कहा करते हो

ना कोई ख्वाब ना किसी उम्मीद की गुंजाईश
फिर इन रेशमी धागों से क्या बुना करते हो  

खुद तो कुफ्र के मुलाजिम बन के हो बैठे
मियाँ किसकी खातिर इतनी दुआ करते हो 

एक लम्हा था साँसों का वो गुजर गया 'तीर्थराज'
माजी की सड़क पे राह जिसका तुम तका करते हो  



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