लम्हों की स्याही में तसव्वुर का ब्रुश डुबोकर
कुछ अशार हमने जब वक़्त की जमीं पे उकेरे
तो यूँ लगा जैसे सदियों से मुरझाई पड़ी उस मिट्टी को
किसी ने बूँद-बूँद जिंदगी पिलाई हो |
एकदम से उस मिट्टी ने अपने फेफड़े निचोड़ कर एक लम्बी सी आह भरी
और सारे अशार कोंपल की मानिंद फूटकर अटखेलियाँ करने लगे|
आफ़ताब की लौ ने उनके बदन को सेंका
तो मेहताब ने रूह में रंगतें भरीं |
सेहरा-ओ-शब् की आदतों तले वो हरे-भरे फुनगे
जो कल तलक घुटनों पे रेंगते थे
आज ढेले की बैसाखी छोड़ अपनी जड़ों पे उठ खड़े हुए |
हर-एक कोंपल अब पेड़ बन चुका था |
उसकी एक शाख पे नज्मों का जोड़ा
घोंसला बनाये-डेरा डाले झूमता रहता था |
शोहरत की आंधी को ये खबर पहुंची
तो उसने पत्ता-पत्ता बटोर कर अपनी जेबें भर ली |
आफ़ताब किसी सुबह फिर उनसे मिलने आया
तो उसकी आँखें चौंधियां उठीं |
वो पेड़ बाल मुंडवाकर चाणक्य के अहम् को भी चुनौती दे रहे थे |
नज्मों का वो जोड़ा भी नहीं था |
"शायद शोहरत की आंधी में उसके तिनके बिखर गए होंगे,बँटोरता होगा"
ये सोचकर बेचारा आफ़ताब भी गोधुली तले सर छुपाने लौट पड़ा |
मेहताब की बड़ी अच्छी बनती थी उन पेड़ों से अब,
एक-एक फुनगी सितारों तक पहुँच गयी थी |
वो नज्मों का जोड़ा भी
वहीँ कहीं पंख फडफडाता मिल जाता उसे |
पर वो मिट्टी फिर उदास हो चली थी
जिनकी धमनियां चूसकर वो कोंपल फूटे थे |
अक्ल की बारिश ने थोड़ी-बहुत फुहारें उधार दीं उन्हें
तो वो मुरझाये रुखसार की झुर्रियों को सींचने में खर्च हो गए |
सफेदी की चादर ओढ़े,गिनी-चुनी दो-चार बत्तीसी दिखाता
काँपता रहता है कहीं |
लम्हों की स्याही भी ख़त्म होने चली है,
ठूंठ पड़े उस ब्रुश पे अब रंग चढ़ते ही नहीं |
एक नए कोंपल ने फिर आवाज़ लगायी है आँगन में,
उसी बूढ़े बरगद की मूछों से निकल कर |
पिलाने फिर किसी मिट्टी को
"बूँद-बूँद जिंदगी"
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