Saturday, March 05, 2011

वो भी एक दौर था..!!!
रहते थे बेबाक हम गैरों की सरपरस्ती से 
खुद ही को खुदा मानकर जीते थे मस्ती से
वो भी एक दौर था..!!!

ना काफ़िल-ए-गम  कभी सजाये थे हमने
ना  कभी हँसी से बैर किया करते थे
वो  भी एक दौर था..!!!

यूँ लगता था,जश्न-ए-जहाँ मुकम्मल है हर तरफ
महफ़िल-ओ-मदहोशी की हम शान हुआ करते थे
वो भी एक दौर था..!!!

कहकहों की गूँज में कटती थी शाम-ओ-सहर 
खामोशियों में भी किस्से तमाम हुआ करते थे
वो भी एक दौर था..!!!

जहां को जीतने का शौक कभी आया ही ना जेहन में
क्या बताएं,उस मदरसे के हम ही इमाम हुआ करते थे
वो भी एक दौर था..!!!

अल्फाज़ बयां करने की अहमियत समझी ही ना कभी
इशारों में भी हम यूँ ही बदनाम हुआ करते थे
वो भी एक दौर था..!!!

इस दौर-ए-जहाँ से उम्मीदें तो कब की छोड़ दीं हमने 
खलिश निगाहों में हो,तो अश्कों के जाम हुआ करते थे 
वो भी एक दौर था..!!!

बलंदी की शाख पर अब बैठा है ये शायर जब
रंग-ओ-नूर हैं,कल मसले भी गुमनाम हुआ करते थे
वो भी एक दौर था..!!!







2 comments:

  1. wah wah kya bat hai sangam saab!!

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  2. karte the nigaahon se salaam hum kabhi logon ki.......ab ye jubaan shabd nai deti.....jab ho jarurat kisi asal tareef karne ki ye jawaan kyun shabd nai deti....maasaallaah maja aa gaya!

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