Monday, March 14, 2011

संगम...(त्रिवेणियां)

सुबह-सुबह नींद मेरी कह रही थी मुझसे
"रात करवटें बहुत मुस्कुरा कर ली तुमने"

भीगे हुए तकिये को हमने चुपचाप पलट दिया.||


क्यूँ  जलाकर शौक से..
रिमझिम की दुआ करते हो अब ??

मरहम जख्म मिटाते हैं,दाग नहीं.||


माँ ने आँगन से आवाज़ लगायी..
"लाओ तुम्हारे कुरते के दाग साफ़ कर दूं"

हमने सहजता से कहा,"दामन खुरच रहे हैं अभी".||


तमन्नाएं आज फिर कह रही थीं हंसकर
तुम्हे अब भी उस नज़र की आस है ??

दो बूँद गिरते ही, आँखें मूँद ली हमने.|| 


कुछ हसरतें उधार मांगी थीं उनसे
पुरानी तस्वीरें थमा गए वो

कहा, 'अठखेलियाँ दुकानों में नहीं मिलतीं'


राह चलते किसी को धर दबोचा
माथे की लकीरें पढ़ीं, सिंहासन दे डाला

भाग्य और पुरुषार्थ में कितना अंतर है 


चश्मे की धूल साफ़ कर रहा था मैं
सोचा, वो नज़ारे और मनहर दिखेंगे

नजरों के धुंधलके को भूल गया था शायद 


बस कि फिर से जिन्दा हो उठता हूँ 
साल में एक दिन इसी रोज़ अक्सर

बाकी  वक्त उम्र गुज़ारने में कट जाता है 


वो ATM के दरवाजे पर बैठकर भीख मांगती है
हरे, पीले और गुलाबी नोट निकलते हैं जहाँ से 

सिक्के निकलते तो शायद उसकी भूख मिट जाती 


सुनकर दो गजलें तौहीन-ऐ-अंदाज़ से कहा उसने
'शायरी आपकी, वजन से महरूम लगती है जनाब'

लम्हों की लौ में सूख जाते हैं, अश्क से भीगे लफ्ज़ 




मेरी रचनायें पढ़कर, अक्सर पूछ लेते हैं लोग
'जी ये हिंदी कहाँ से सीखी आपने, बताएँगे जरा'

'हिन्दोस्ताँ में पैदा हुआ हूँ' यही तशरीह कम है क्या 


वो सियासी अंदाज़ में निभाता है इश्क के दस्तूर भी
शाम से लेकर सेहर तक बदल लेता है महबूब अपने

ये कमबख्त दिल्ली की हवा है, किसी को नहीं बक्शती


देर तलक जगते-जगते लाल नजर थी उसकी
कंधे झुक से गए थे किसी बूढ़े बाँस के मानिंद

कल ही तो स्कूल में दाखिला कराया था उसका 


खींच कर पेंसिल से कुछ लकीरें...आड़ी, तिरछी 
चितेरों की मानिंद तेरा चेहरा बनाने की ठानी 

कुश्ता-ए-खू ठहरे, फिर से ग़ज़ल निकल पड़ी 












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