Friday, March 04, 2011

ग़ज़ल

वो उम्मीदों के फेरे थे या मेरी नज़रों का सूनापन
सच-ओ-फरेब की खबर ही नहीं रही कभी 

हर एक लफ्ज़ पे लगा तेरी, कि तू ही खुदा है
काबा-ए-शरीफ जाने की जेहमत ही न की कभी

यूँ तो आज भी ये लगता है,मेरा वहम ही होगा
मुदत्तों जो बात थी, वो बात भी हुई नहीं कभी 

तेरी गुस्ताखियाँ भी मुस्कुरा कर जो छोड़ दी हमने
काबिल-ए-माफ़ी के तुम काबिल रहे भी न कभी

मत कहो, "आज भी तुम्हारा हूँ मैं" ,'तीर्थराज'
उस रहनुमाई की सोहबत के,लायक ही न थे कभी.||










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