Saturday, March 05, 2011

ग़ज़ल 
सलामत-ए-होश में भी हम वो सब कह जाते हैं
यूँ मेरे मदहोश होने का इंतज़ार ना किया कर

मुफलिसी अमीरी से कहती फिरती है रात दिन
ख़ाक में मिल जाओगी,'मेरा दीदार ना किया कर'

पाक हैं हम अपनी नाकामियों के भी संग
ऐ कामयाबी,हराम दिखा यूँ नापाक ना किया कर

'तीर्थराज' सजदे में झुकता है खुदा के ,पाँचों पहर 
मंदिर-ओ-मस्जिद-ओ-गिरजे को यूँ नीलाम ना किया कर.!!!



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