Tuesday, March 22, 2011

ग़ज़ल


दीये की लौ भी बेइन्तहा जलन देने लगी है
मिट्टी की सोंधी महक,अब दीवारों में ढलने लगी है

कल उठता था धुआं उस किनारे से आँगन में
आज कोने-कोने से रोटियां जलने की महक आने लगी है

पत्थरों को बांटकर वो कब के ले गए घरों में अपने
खुदा को बांटने की साजिशें भी अब रोज होने लगी है

गम था,'चमन को सींचने में पत्तियां झड़ने लगी हैं कुछ'
बरसों की मिल्कीयत अब यूँही खैरात में बँटने लगी है ||


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