ये इबादत जिसकी करते हैं हम वो खुदा कहाँ है
चीथड़ों में पलने वालों का वो रहनुमा कहाँ है
फलसफा दिखलाओ कोई इन टूटती निगाहों का
बेख़ौफ़ मंजर के वादों का वो शहंशाह कहाँ है
सजदों में असर भी है, अब अमीरी के केवल
मुफलिसी के बरकतों का वो आलमपनाह कहाँ है
काबे के पत्थर भी लगता है, घिसने लगे हैं अब
यूँ हज को जानेवालों का वो काफिला कहाँ है ??
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