अच्छा लगा कि आज फिर उन्हें याद तो आई है,
ये कैसी हँसी कि निगाहें समंदर हो आई हैं .
दीदार-ए-अक्स की तवक्को नहीं थी मुझको कभी भी.
अरमाँ मचल गए कि आरजू मुझतक खींच ले आई है.
सोहबतें तो खूब की थीं हमने खामोशियों से भी उनकी,
ग़मज़दा हो गए लेकिन बात जब जुबाँ पे आई है.
मेहताब का सबब किसी दिन पूछ लिया था उनसे.
चाँद को क्या खबर,चांदनी क्या-क्या रंग लायी है.
वो आज भी कहता है यूँ दिल्लगी ना करो,'तीर्थराज'
कैसे समझाएं उन्हें कि कश्ती बहुत दूर निकल आई है..!!!
awesome..:)
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