जिसके सीने में जख्म नहीं एक जुनूँ है
जिसकी खातिर अब दर्द ही एक सुकूँ है
मौत मुंसिफ थी तेरी सो आ गई 'गुलज़ार'
जिंदगी से उसका नाता फिर क्यूँ है,क्यूँ है
वो खुद को मिटाने पर आमादा है ऐ खुदा
मेरे यार की तबीयत आज कुछ यूँ है,यूँ है
बहुत हुआ कि हौसलों की भी इन्तेहा हो गई
तमाशों में भी लेके जाता नजर-ऐ-खूँ है,खूँ है
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