Sunday, April 08, 2012

ग़ज़ल

बयान-ऐ-गम पे भी मुक़र्रर-ऐ-इरशाद कहने लगे
एक छोटी सी ख्वाहिश को तुम फ़रियाद कहने लगे

है कौन यहाँ आबाद जरा शक्लें दिखाए मुझे
किसी ने इश्क क्या किया,उसे बर्बाद कहने लगे

दो लफ्ज़ आज भी उधार हैं तुम पर मेरे 'तीर्थराज'
जरा शोहरत क्या मिली खुद को उस्ताद कहने लगे 

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