Monday, April 18, 2011

ग़ज़ल

इस हुकूमत से  उम्मीद कोई बचा ना रक्खी है
सियासी गुफ्तगू में पड़कर अब क्यूँ फिजूल होना 

फकीरों के चोगों का गर्द तो सबने खूब देखा है
किसी ने  देखा नहीं शाहों का जर्द-जर्द होना

बेवफाई के नुस्खों पे अपने क्यूँ इतराता है काफिर
हमने चाहा ही नहीं कभी तेरा हमसफ़र भी होना

गुलाबों की लाली  तो बेइन्तहा  भाती है सबको 
कभी  देखा  भी  है  काँटों  का  लहू-रंग  होना

लाशें अब कब्रों की मोहताज हैं अपनी ही सरजमीं पे
क्या गुनाह है किसी का बस मुसलमान ही  होना

इज्जत-ओ-आबरू रखैल हैं  हैवानियत के घर की
जानवरों  को  भी  शौक  नहीं  अब  इंसान  होना

मोहब्बत की गजलों का इल्म बहुत होगा आपको
अब  देखोगे  कलम से भी  क़त्ल-ए-आम  होना  ||






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