Tuesday, July 19, 2011

ग़ज़ल

मुंडेर पे अब कबूतरों के घोंसले नहीं मिलते
शहरी परिंदे लगता है 'पर' हिलाना भूल गए हैं

हर किसी के चेहरे पे एक अलग सी मायूसी है
बच्चे गलियों में लगता है खिलखिलाना भूल गए हैं 

रिश्तेदारियां दीवारों से बंटने लगी हैं घर-घर
अब तो इस मकाँ के कुत्ते भी दुम हिलाना भूल गए हैं

कहाँ हैं हर नुक्कड़ पे वो चाय की दुकानें
काबुलीवाले भी मोहल्लों में आवाज़ लगाना भूल गए हैं

कभी सियासी मशवरों के दौर थे,महफ़िलें थीं 
आज-कल बूढ़े भी हुकके गुड्गुराना भूल गए हैं

ना वो चवन्नी है,ना रुपये की सेर भर जलेबियाँ
सिक्के भी नोटों में ढलकर खनखनाना भूल गए हैं

आबरू नुमाइश में  लुट रही मोहताज़ होकर मुफलिसी की
सड़कों पे पलनेवाले अब चेहरे संवारना  भूल गए हैं 

क्यूँ खफा हो इस कदर तुम खुदा से 'तीर्थराज'
ये वही फ़रिश्ते हैं जो अब इन्सां बनाना भूल गए हैं ||




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