Tuesday, November 09, 2010

रिक्शावाला

औरों को क्या?
खुद को ढो रहे हैं हम,
जिंदगी के नाम पर
मौत जी रहे हैं हम
पेट और पीठ मिलकर
थके हुए से प्राण हैं
हारी हुई मेरी चमू में
हँस रहे भगवान हैं
झेठ की दुपहरी में
तन झुलसता जाता है
पूस की उस रात में
सर्द भी तर्पाता है
बस एक परदे की ओट में
आबरू मेरी है धरी
धुन्मुनो की बिलखती
सिसकियों से घिरी
कंठ छिल चुके हैं उनके
चंद दानो की आस में
अब तो चूल्हे पर उबलता पानी भी
हँसता है रंजिश-ए-उपहास में
आटे को यूँ घोल-घोलकर
कब तक पीते रहेंगे वो
जठराग्नि को यूँ आंसुओं से
कब तक भिगोते रहेंगे वो|
कब तक क्षुधा यूँही इनके
अश्क पीती जाएगी
कीट समझकर मानवों को
वो यूँही तर्पाएगी
अट्टालिकाओं में सेज पर है
सो रहा कोई मौज से
बेफिक्र इसी धरा पर पड़ी
झुग्गियों की फ़ौज से
रक्त मेरी नसों का भी
एक दिन उबलकर आएगा
जग परन्तु फिर भी लेकिन
न चकित भर्मायेगा
लाख रोके यह मनुज
अपनी ये अंतर्भावना
पशु बनकर गिरेगा वो
पतन में मत कोसना
शोणित के प्लावन से महि
तृप्त होती जायेगी
पर धुनमुनो की क्षुधा
प्यासी ही रह जाएगी....

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