बचपन की अटखेलियों से लेकर आज किशोरावस्था की नोक-झोंक तक,सदा से यही इक्षा रही थी की अध्ययन और ज्ञानोपार्जन में मैं सर्वोच्च से सर्वोत्तम तक जाऊं|और आज जब खुद को देश के सबसे बड़े तकनीकी संस्थान में पाता हूँ तो ऐसा लगता है मानो वैसी अवधि आ गई हो जो काल की गणना में आती ही नहीं|
चंचलता और चपलता के बीच मन में एक अजीब सी शांति है|प्रतिस्पर्धा है,पर एक संतुष्टि की भावना के साथ| है हमें जाना कहाँ,चले है कहाँ से हम;इन सब ख्यालों के बीच आज लगता है हम थम से गए हैं| पर ये रुकना हमारी निस्पंदता नहीं,वरन शारीरिक एवं मानसिक स्थिरता का वो मिलन बिंदु है जहाँ से एक नए युग की शुरुआत होगी,एक नए युग का आगाज़ होगा-"मेरा युग,हमारा युग"....
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