Tuesday, November 09, 2010

प्रतिज्ञा

धमनियों में बहते 
रक्त की पुकार है
रुको न तुम झुको न तुम 
यही समर की ललकार है
मुट्ठियों को भींचकर 
शोणित कणों को त्वरित करो
अचल हो,विजयी हो
पर अब तुम अजेय बनो
बाल्व्य का  पहिया
यूँही धिल्मिल लुढ़क जायेगा
तुम नहीं तो और कोई
शिखर तक पहुँच जायेगा
चाह यह रखो
है गगन तुम्हे भेदना
नहीं केवल सितारों की 
टिम्तिमो से खेलना

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