Monday, November 08, 2010

यूँ तो अकेला ही चल रहा हूँ मैं ...

रात का धुंधलका है ,
गहराती चांदनी में मैं चल रहा हूँ 
रास्ते खामोश हैं
 पत्तियों की सरसराहट को भी मैं सुन रहा हूँ 
किसी अनछुए छुअन की अनुभूति सी हो रही है 
सांस दर सांस 
मेरी रूह भी महक रही है |
यूँ तो अकेला ही चल रहा हूँ मैं 
पर इन हवाओं में तेरी हर आहट सुन रहा हूँ मैं 
स्वाति की सीपियों में 
मोती बंद होते हैं जिस तरह 
तुझे तुझसे लेकर 
खुद में वैसे ही सिमट रहा हूँ मैं |
यूँ तो अकेला ही चल रहा हूँ मैं .....
झिलमिलाती नजरें तलाश रही हैं तुझे 
इन आँखों में तेरी तस्वीर लिए भटक रहा हूँ मैं 
उस आगोश की चाह में 
मेरा रोम-रोम पुलकित है
पल-पल तेरी बाहों में टूटकर बिखर रहा हूँ मैं |
यूँ तो अकेला ही चल रहा हूँ मैं...
खामोशियाँ हैं चीख-चीख कर कह रही मुझसे
अपनी तनहाइयों से ही तो बातें कर रहा हूँ मैं
ये जानकार भी ,
की तेरा अक्स कहीं नहीं है आस-पास 
क्यों,....क्यों..
खुद के साए में भी 
हर पल तुझे ही ढूंढ रहा हूँ मैं |
यूँ तो अकेला ही चल रहा हूँ मैं ... 



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