इक जरा सी तूल क्या दी, तुम पतंगें उड़ाने लगे
जुर्रत प्यादों की हुई, वजीर से नजरें मिलाने लगे
वफ़ा में हैं कि कद्र है ना कोई तलब-ओ-उम्मीद
खुदा को छोड़ हम कहाँ सर अपना झुकाने लगे
दूसरे सिरे पे धागे के तुम भी बंधे थे 'तीर्थराज'
बुझती लपट को फूंक देकर क्यूँ सुलगाने लगे
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