Thursday, November 03, 2011

हर शख्स नहीं इस कदर अलफ़ाज़ की कारीगरी करता है
ये हुनर बाज़ारों में नहीं बिकता ..जो खरीददारी करता है

सुखन का इल्म हो जिगर में तभी मुशायरों में आया करो
"तीर्थराज" कभी शायरी नहीं करता..वो जादूगरी करता है  

मुझे और दिल्लगी का इल्जाम ना दे "तीर्थराज"
एक उससे मोहब्बत ने ही दिल की लगा रक्खी है  
पैमाने से छलकता नशा बेशक उसकी आँखों से कम है "तीर्थराज"
हम तो पीते हैं इस शौक से कि उस नजर से रू-ब-रू ना हो सकें 

Wednesday, November 02, 2011

'मधुशाला'


"तीर्थराज" के अधरों को जब छू गयी पावन हाला
मदिरालय में होकर हर्षित झूम उठी साकी बाला
अगणित दफे सुने थे उनसे जलवे इस पैमाने के
एक बार जो चखी तो मैंने पी ली पूरी 'मधुशाला'


हाथ उठाकर देखो तुम भी रास-सुरा का एक प्याला
फेंक उतारेगी ये तेरी जुबाँ पे रक्खा वो ताला
 मदिरालय में अपने आंसू "तीर्थराज" तुम ले आओ
शुरू करेंगे पीनेवाले,ख़त्म करेगी 'मधुशाला'


मृगनयनी किसी पर मैं था ह्रदय लुटाता मतवाला
छलक-छलक खुद को छलकाकर पास बुलाती थी हाला
अधरों से जिसके पी-पी कर "तीर्थराज" इतराता था
चला गया है यौवन उसका,जवां अभी है 'मधुशाला'




काशी-तट पर कुषा बिछा मैं जाप रहा तुलसी-माला
एक अंजुली में गंगाजल..दूजे में भर कर हाला
किस मंथन में जुटे हो योगी,रघुवर ने ही पूछ लिया
पाप,पुण्य को तोल रहा हूँ.प्रभु जीत रही है 'मधुशाला'

ग़ज़ल

पैमाने मैकदों में तरसते होठों की चाह करते हैं
शौकिया पीनेवाले कहाँ साकी की परवाह करते हैं

चाहत  में बेकरारी नागवार गुज़रती है अक्सर 
बासफा इश्क करनेवाले सब्र-ए-निगाह करते हैं 

तुमने देखा नहीं हुनर-ए-सुखन का जादू "तीर्थराज"
मरघट  में जो शेर पढूं तो मुर्दे वाह-वाह करते हैं 


आशिकी अल्फाज़ को भी बरबस ही ग़ज़ल बनाती है
लफ्ज़-ए-हकीर को भी ये नज़्म-ए-अमल बनाती है

चांदनी हया से पलकें मूँद लेती है "तीर्थराज"
वो लड़की जब कभी आँखों में अपने काजल लगाती है 

Tuesday, November 01, 2011

कहते हैं लोग वो तेरे काबिल नहीं है "तीर्थराज"
गुस्ताख तो हम भी हैं जो आदत से मजबूर हुए