Wednesday, November 02, 2011

ग़ज़ल

पैमाने मैकदों में तरसते होठों की चाह करते हैं
शौकिया पीनेवाले कहाँ साकी की परवाह करते हैं

चाहत  में बेकरारी नागवार गुज़रती है अक्सर 
बासफा इश्क करनेवाले सब्र-ए-निगाह करते हैं 

तुमने देखा नहीं हुनर-ए-सुखन का जादू "तीर्थराज"
मरघट  में जो शेर पढूं तो मुर्दे वाह-वाह करते हैं 


आशिकी अल्फाज़ को भी बरबस ही ग़ज़ल बनाती है
लफ्ज़-ए-हकीर को भी ये नज़्म-ए-अमल बनाती है

चांदनी हया से पलकें मूँद लेती है "तीर्थराज"
वो लड़की जब कभी आँखों में अपने काजल लगाती है 

Tuesday, November 01, 2011

कहते हैं लोग वो तेरे काबिल नहीं है "तीर्थराज"
गुस्ताख तो हम भी हैं जो आदत से मजबूर हुए 

Sunday, October 30, 2011

नजदीकियां बढ़ाने का भी ये बड़ा अच्छा तरीका है "तीर्थराज"
गम-ए-गुफ्तगू भी हमसे की,मेरी तलब से ऐतराज़ भी है 

Wednesday, October 26, 2011

दास्तान-ए-इश्क में ये कलाम भी लिख लेना 'तीर्थराज'
यहाँ सांसें तो उधार मिल जाती हैं,जिंदगी नहीं मिलती 

Wednesday, October 19, 2011

ग़ज़ल

मुदत्तें हुईं कलम से रुक्सती किये हुए,आज ग़ज़ल लिखते हैं
किसी ने चुपके लगता है याद किया है,आज ग़ज़ल लिखते हैं

शाम आवारा रोशनियों के बाबस्ता गुज़र जाती थी मेरी
चरागों ने थोड़ी लौ बुझाई है दोस्तों,आज ग़ज़ल लिखते हैं

ना शौक ना इल्म ना किसी से तगाफुल-ए-जुस्तजू का डर
उनके रेशमी उलझनों से हुए बेबाक,आज ग़ज़ल लिखते हैं

वो पुकारे मेरा नाम तो तुम भी हँस कर कह देना 'तीर्थराज'
अकेले हैं,किसी के साथ हैं,तन्हा हैं,आज ग़ज़ल लिखते हैं 

  

Monday, October 17, 2011

मुझसे ना पूछिये छलकते पैमानों का सबब 'तीर्थराज'
मैं अपने महबूब की आँखों से काजल चुराकर आया हूँ