मुदत्तें हुईं कलम से रुक्सती किये हुए,आज ग़ज़ल लिखते हैं
किसी ने चुपके लगता है याद किया है,आज ग़ज़ल लिखते हैं
शाम आवारा रोशनियों के बाबस्ता गुज़र जाती थी मेरी
चरागों ने थोड़ी लौ बुझाई है दोस्तों,आज ग़ज़ल लिखते हैं
ना शौक ना इल्म ना किसी से तगाफुल-ए-जुस्तजू का डर
उनके रेशमी उलझनों से हुए बेबाक,आज ग़ज़ल लिखते हैं
वो पुकारे मेरा नाम तो तुम भी हँस कर कह देना 'तीर्थराज'
अकेले हैं,किसी के साथ हैं,तन्हा हैं,आज ग़ज़ल लिखते हैं
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