Monday, October 17, 2011

मुझसे ना पूछिये छलकते पैमानों का सबब 'तीर्थराज'
मैं अपने महबूब की आँखों से काजल चुराकर आया हूँ 

सेहरा में पलने वालों ने कभी शाख-ए-गुलाब नहीं देखे
एक सितारा देखा है कभी सैकड़ो आफ़ताब नहीं देखे

मेरी  नाकाम तबीयत पर ऐ कहके लगानेवालों
आँखें देखी हैं तुमने मेरी,कभी मेरे ख्वाब नहीं देखे 

Monday, October 10, 2011

जाहिरी जीत पर बेशक इतरा सकते हो तुम
तेरी शोहरतों से हमें कोई ऐतराज़ नहीं 

ले जाओ लूटकर तमगे घरों में अपने 
काबिलियत मेरी,चंद इनामों का सरताज नहीं

ये कुछ लोग जो तस्वीरें रोज बदलते हैं 'तीर्थराज'
इनसे कहो,शक्शियत कभी चेहरों की मोहताज नहीं 

Wednesday, September 28, 2011

ग़ज़ल

सफेदपोशों को तुम क्या सियासत सिखलाओगे भला
राह चलते इनकी टोपियाँ क्यूँ उछलवाओगे भला

इस घर में पहले ही सौदागर बहुत से हैं मौजूद
फिर उन बाज़ारों में क्यूँ तुम जाओगे भला

शहर का हर शख्स मजमे में शामिल है 'तीर्थराज'
तुम आखिर किस-किस पे उंगलियाँ उठाओगे भला   

Saturday, September 17, 2011

अच्छा लगता है...


अच्छा लगता है...
झटक कर जुल्फ जब तुम गेशुओं से बारिशें आज़ाद करती हो
अच्छा लगता है...


अच्छा लगता है...
भींच कर होंठ जब तुम अधरों से मुस्कुराहटें इरशाद करती हो 
अच्छा लगता है...


अच्छा लगता है...
बलखा कर चाल जब तुम घुंघरुओं से धुनों का साज करती हो
अच्छा लगता है...


अच्छा लगता है...
झुका कर पलकें  जब तुम निगाहों से इशारे इजाद करती हो 
अच्छा लगता है...

अच्छा लगता है...
जता कर इश्क जब तुम चाहत से मोहब्बतें आगाज़ करती हो
अच्छा लगता है...

अच्छा लगता है...
लिपटा कर दुपट्टा जब तुम उँगलियों से बहाने चार करती हो
अच्छा लगता है...


अच्छा लगता है...
छुपा कर रस्म जब तुम सजदे से दुआएं फ़रियाद करती हो
अच्छा लगता है...

अच्छा लगता है...
बता कर राज़ जब तुम खामोशियों से गुस्ताखियाँ इकरार करती हो 
अच्छा लगता है...

अच्छा लगता है...
मिटा कर फासले जब तुम सरगोशियों से सोहबत-ए-नाज करती हो
अच्छा लगता है...


अच्छा लगता है...
छुपा कर हुस्न जब तुम चिलमन से परवान-ए-दीदार करती हो
अच्छा लगता है...

अच्छा लगता है...
बदल कर करवट जब तुम तकिये से,"सुनो तीर्थराज" कहती हो
अच्छा लगता है...

Tuesday, September 13, 2011

ग़ज़ल

ये इश्क नहीं 'फ़राज़' हमें तो चाहने की आदत है
सितम सहकर भी उनके,मुस्कुराने की आदत है

जिन्हें देखना है वो शौक से देखें चाँद को
हमें तो यूँही हर रात जागने की आदत है

महफ़िल में मैंने इल्जाम लिया तो क्या किया
उसे तो वैसे भी उँगलियाँ उठाने की आदत है

मोहल्ले में फिर कभी तुम बेपर्दा ना निकलना
गली के बूढों को भी सीटियाँ बजाने की आदत है

'तीर्थराज' क्यूँ बात-बात पे खफा हो जाते हो तुम
इन्सां हैं हम भी ,ये खताएं करने की  आदत है 

Tuesday, August 16, 2011

कभी-कभी

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि हम 'दो' ना रह पाते तो बात और होती

ना जी भर के देखा कभी तुम्हे
ना इसकी तवक्को हुई अब तक
जो अक्स मेरी नजरों में है छुपा 
वो नज्र हो जाता तो बात और होती

वो लब खामोश हैं गर,तो मुझे कोई गम नहीं
मैं हो जाता जो तेरे लिए गैर
तो बात और होती

एक अरसे से हमने वो सुबह नहीं देखी
नजरें कि जैसे बेजुबां हो चली हैं अब
मुदत्तों बाद वो शाम फर आ जाये
तो बात और होती

कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि हम 'दो' ना रह पाते तो बात और होती ||

मिले तो थे बेहिसाब नजराने मोहब्बत करने को
जो तू मिली होती मेरी हम्न्फज़ कहीं
तो बात और होती

एक रस्म है ये भी,तुम परदे में रहो हमसे
एक रस्म है ये भी,मैं सहरापसंद मिलूं तुमसे
दस्तूर जमाने के हैं ये
चाँद पूनम का दिख जाता
तो बात और होती

ये माना हम कह नहीं सकते जुस्तजू क्या है
खामोशियाँ गर तुम जो समझ जाती
तो बात और होती

एक नाम जो रेत पे लिखता हूँ मैं हर दिन
एक महल जो ख्वाबों का मैं सजाता हूँ हर दिन
कभी हम 'मैं' से 'हम' हो जाते 
तो बात और होती
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि हम दो ना रह पाते तो बात और होती ||