Wednesday, November 21, 2012

ग़ज़ल


वो ख्यालों में भी मेरा जिक्र छेड़ दे तो मोहब्बत लिख देता 
फेर कर उँगलियों कोरे कागज़ पे अपनी ज़हमत लिख देता

झील में फेंके हुए मंजर कोई लौटाए ना लौटाए मुझे लेकिन  
फिर उस किनारे पे मिल जाता, मैं सारी हसरत लिख देता   

कितने ही यारों की कहानियाँ बयाँ की हैं मेरे अल्फाज़ ने
'शहजाद' कोई महबूब ना मिला, जिसे मैं ख़त लिख देता   


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