Tuesday, January 29, 2013

ग़ज़ल

मौसमी हवाओं में रंगत नयी-नयी सी है 
वो आ रहा शहर में खबर उड़ी-उड़ी सी है

कल परिंदों ने कहा, 'एक तुम ही नहीं हो घायल'
आह हर किसी के दिल में यहाँ दबी-दबी सी है 

हाय कि तेरा शर्मना वो धूप की अदाओं जैसा  
लगता है जैसे सेहरा की नज़र झुकी-झुकी सी है

रात तुम ख्वाब में क्या आये बवाल हो गया 
माँ सुबह कह रही थी कि सूरत खिली-खिली सी है 

हुई मुद्दत राह तके अब आ भी जाओ 'शहजाद'
घड़ी दर घड़ी वक़्त-ओ-मुझमे ठनी-ठनी सी है 


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