Tuesday, August 16, 2011

आजादी के नाम...

सियासी कलमकारों की लिखी हुई एक बिन-पढ़ी किताब हूँ
मुफलिसी पे हैं जो डालते परदे मैं उसी अमीरी का हिजाब हूँ

चर्चे बहुत हैं इस मुल्क के अब पड़ोसियों के आँगन में
अरे कहने को तो मैं भी किसी आशियाने का आफताब हूँ

बदल रहे हैं यहाँ आजकल गुजारिशों के भी मायने 
सफेदपोशों की हुकूमत में मैं खुद ही एक फ़रियाद हूँ

तिरंगा बेचकर भी बेटा,जब बाप को कफ़न दे नहीं पाया
फिर कैसे कहते हो,'तीर्थराज' कि आज मैं आजाद हूँ ??? 

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