Monday, February 24, 2014

किसी से रिश्ता ना जोड़ लें सो पलकें झुका रक्खी थी
अपनी आँखों को उसने ये तरकीब सिखा रक्खी थी

हम  किसे बिस्मिल्ला करते औ' किसे चूमते 'शहजाद'
उसने उतार कर मेहँदी जो जायके में मिला रक्खी थी  

Monday, February 17, 2014

ना सही मरासिम हमसे फासले पर ही मिला करो
ये भी कोई अंदाज़ है, खफा भी नहीं औ' गिला करो 
कुछ लफ्ज़ बर्बाद कर खुद को सुखनवर कह लें
बाद मुददत के 'ग़ालिब' आज याद आया है फिर

#GHALIB
कुछ उधार सा है चंद बरसों का मुझ पे 'इसका'
कोई वो वक्त दे जाए तो क़र्ज़ से निजात पाऊँ

#KGP 

Friday, August 23, 2013

नज़्म

हम चुप-चुप से बैठे रहते हैं
एक दूसरे के साथ होकर भी
जब कोई तीसरा आ कर
जिक्र छेड़ देता है किसी चौथे का
तब दो बातें हो जाती हैं आपस में
ख़त लिखने का तो अब रिवाज़ ही उठ गया
नहीं तो पोस्टकार्ड पे लिखे वो लफ्ज़
बोलते से मालूम होते थे अक्सर
टेलीफोन की घंटियाँ बजने पर भी
वो उत्साह नहीं होता, दौड़ कर चोगा उठा लेने का
कई घरों में तो वो चोगे हैं भी नहीं
लोग जेब में डाल कर ही घूमते हैं दूरभास को
फिर भी बातें नहीं होती कभी
शायद निदा फाजली को सुन रखा है सबने
" बात कम कीजे, जहानत को छुपाते रहिये"
जहीन नहीं हैं हम, बस उम्र की चादर ओढ़े
थोड़े से बड़े हो गए हैं ॥




Sunday, June 16, 2013

नज़्म

मैं तेरी तस्वीर के साये में ...
सुनता हूँ मेहँदी हसन को हजारों बार
जब-जब वो कहते हैं, "रंजिश ही सही"
यूँ लगता है धडकनें निकाल कर रख देंगे
तुझे बुलाने की खतिर।
तू बुत तो नहीं है, फिर सुनता क्यूँ नहीं।
पढ़ के पांच नमाजें रोज़ तो लोग खुद को भी बुला लेते हैं।।


नज़्म

वो जब तुम पिछली दफा मिले थे
जाने कौन सी खुशबू ओढ़ रक्खी थी ...
हंस के जो कुछ कहा था उस रोज़
लिपट कर जुबाँ के सहारे तेरी
एक कतरा मुझ तक भी पहुँच आया था ।
उगल कर साँसों को अपनी मैंने
एक शीशी में सहेज कर रख लिया है उसे ।
अक्सर इत्र की तरह लगाकर
निकल जाता हूँ शहर में, जाने किस मोड़ पर
अपनी महक से तुम हमें पहचान लो ।