Sunday, June 16, 2013

नज़्म

मैं तेरी तस्वीर के साये में ...
सुनता हूँ मेहँदी हसन को हजारों बार
जब-जब वो कहते हैं, "रंजिश ही सही"
यूँ लगता है धडकनें निकाल कर रख देंगे
तुझे बुलाने की खतिर।
तू बुत तो नहीं है, फिर सुनता क्यूँ नहीं।
पढ़ के पांच नमाजें रोज़ तो लोग खुद को भी बुला लेते हैं।।


नज़्म

वो जब तुम पिछली दफा मिले थे
जाने कौन सी खुशबू ओढ़ रक्खी थी ...
हंस के जो कुछ कहा था उस रोज़
लिपट कर जुबाँ के सहारे तेरी
एक कतरा मुझ तक भी पहुँच आया था ।
उगल कर साँसों को अपनी मैंने
एक शीशी में सहेज कर रख लिया है उसे ।
अक्सर इत्र की तरह लगाकर
निकल जाता हूँ शहर में, जाने किस मोड़ पर
अपनी महक से तुम हमें पहचान लो ।


नज़्म

मैं तोड़ कर ले आता हूँ लफ्ज़
हमेशा ही तसव्वुर की शाखों से
और उनको नहला कर रोशनाई के हम्माम में
पहना देता हूँ रेशमी पैरहन
महबूब से गुफ्तगू करने की खातिर।
एक-एक को करीने से सजा कर रक्खा है
अपने होठों पर मैंने।
कभी आकर चूम लो इन्हें बरबस
तो ग़ज़ल मुकम्मल हो जाए। 

Friday, April 19, 2013

चंद मुलाकातों में ही तेरी रग-रग को भाँप रक्खा है 
अपनी शख्सियत को तूने इस चेहरे से झाँप रक्खा है 

वो तो एक ओहदे की तर्ज़ पर खामोश बैठे हैं हम 
वरना तेरी हैसियत का कद हथेली से माप रक्खा है 

Monday, April 15, 2013


यूँ बे-पैरहन ना उतरा करो हमाम मे शहज़ादी
अंगड़ाईयाँ भर-भर के आब भंवर हो जाएगा

Tuesday, April 02, 2013

हमने करीने से सजा कर छोड़ रक्खा था उनकी यादों को
ये बदहवास हवा एक झोंके में सब को जिन्दा कर गयी

Saturday, March 02, 2013

नेकियाँ खरीदीं हैं हमने अपनी शोहरतें गिरवी रख कर 
कभी फुर्सत में मिलना जिंदगी, तेरा भी हिसाब करेंगे