Thursday, November 03, 2011

जिन पलकों की रिमझिम तले मैं कल तक भींगता रहा
वो आज कहता है "तीर्थराज" मेरे अश्कों के लिए उँगलियाँ और भी हैं 
शिकायत क्यूँ करते हो... वो कितना मगरूर हो चला है 
कल तक तो कायल थे "तीर्थराज" उसी अंदाज-ए-गुरूर के 
उसे इतनी शिद्दत से भी ना तका करो "तीर्थराज"
 बेकरारी में कहीं खुद की नजर ना लगा बैठो  
ये चाँद का गुरूर नहीं उसकी फितरत है "तीर्थराज"
तुम बेवजह अपनी खुद्दारी का सौदा कर बैठे 
हमारी शोहरत के ताज दीवारों पे नहीं मिलते
आँधियों के शौक़ीन परिंदे मुंडेरों पे नहीं मिलते

जाकर ढूंढो "तीर्थराज" को लहरों के भंवर में कहीं
हम वो मोती हैं जो कभी किनारों पे नहीं मिलते 
बंदिश-ए-मोहब्बत से कभी दुश्मनी ना कीजै "तीर्थराज"
इश्क वैसे भी बेपर्दा हो जाये तो मुकम्मल मजा नहीं देता 
तुम लाख इनकार करो मेरी गुजारिशों का मगर "तीर्थराज"
देखना ये है कि तुम्हे हमसे बेहतर आखिर चाहता कौन है